26 February 2009
यह आप कैसी बातें कर रहे हैं?
फरवरी के एकदम अंत में यह कहना शायद थोड़ा फीका लगे लेकिन मुझे विश्वास है की यह एक ऐसा विषय है जिसपर जितनी टिप्पणी की जाए कम है - वैलेंटाइन'स डे। अभी चंद क्षणों पहले ही मेरी एक मित्र ने मुझे उस अतिउपयोगी माध्यम 'फसबूक' के ज़रिये एक तस्वीर भेजी, एक बोर्ड की, जिस पर वैलेंटाइन'स डे के विरुद्ध एक पूरा निबंध लिखा गया था। यह बोर्ड कॉलेज के बाहर स्थित था और हमारे महाविद्यालय के होनहार क्षात्रों में से किसी ने उसकी तस्वीर खींच ली। इस निबंध में नजाने क्या अनाप-शनाप बातों (क्या आप जानते हैं की कुंवारी लड़कियों के स्वाभिमान को इस दिन की कृत्रिम प्रेम-प्रणाली से ठेंस पहुँचता है) पर बड़े ही गंभीर रुख में अध्ययन किया गया है। मैनें सोचा, कितनी बेरोज़गारी हो गई है इस देश में जो घर बैठे निठल्ले व्यक्ति जिनहैं लगता है की भारत की लड़कियों को ज्ञान देना उनका कर्त्तव्य हैं। बाल विवाह, नारियों की बढ़ती निरक्षरता, असंतुलित स्त्री-पुरूष अनुपात शिशुह्त्या के कारण उनकी घटती संख्या , देह व्यापार एवं अनेक मानसिक, कानूनी और शारीरिक अत्त्याचार जो की इस देश की महिलाओं पर आए दिन डहे जाते हैं...ये सब कुच्छ लोगों के प्रेम सम्बन्ध होने से कम महत्त्वपूर्ण हैं। मानना पड़ेगा हिन्दुत्त्व विचारधारा को, यह 'समाज के ठेकेदार' और 'सभ्यता के रक्षक' हमारे देश की संस्कृति की 'रखवाली' अगर यूँ ही करते रहे तो भगवान ही मालिक है!
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