15 January 2009

भाषा निराशा

यह विचार मुझे अचानक से ही सूजा है इसलिए भाषा शायद उतनी कलिष्ट और सटीक ना भी हो। जल्दी से अपनी बात कह दिए देती हूँ।

हिन्दीभाषी वार्तालाप तो मानो सार्वजनिक रूप में समापत ही हो चूका है। महाराष्ट्र में कुछ महीने रहने के पशचात जो एक बात मुझे बड़ी प्रशंसा के लायक प्रतीत हुई, वह है यह की मराठी भाषा को कितना सम्मान दिया जाता है। यहाँ की जनता अपनी पूर्वजों की वाणी का आदर करती हैं, इतने गर्व से उसमें प्रचार, विचार व सम्प्रेषण करती हैं...अंग्रेजी आती होगी, तो भी वे मराठी में ही बोलना पसंद करतें हैं।

जब मैं सोचती हूँ की हम हिन्दीभाषी, उत्तर भारतीय नागरिक ऐसा क्यों नहीं करतें हैं, अंग्रेजी की और हमारा झुकाव इतना क्यों है, तो मेरे सम्मुख कई ऐतिहासिक एवं सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कारण प्रकट होते हैं। परन्तु मुझे ऐसा भी लगता है की हम उन कारणों को अपने ज़हन में बहुत वर्षों से, पीड़ियों से, अनजाने में लेकर घूम रहे हैं...मान लीजिये अंग्रेजी राज्य के बाद की एक 'सांस्कृतिक अस्तव्यस्तता' ने हमें घेर रखा है। यह उलझन हमें बड़ी ही निरार्थक वजहों के ज़रिये से विश्वास दिलाती हैं की अंग्रेजी के अतिरिक्त कोई और भाषा बोलना हमारी शान के अनुकूल है। भला यह भी कोई आधार हुआ अपनी भाषा को त्याग देने का? उठा कर बाहर फेंकने का?

अब समय आ गया है जब हम भी ठान लें की हम अपनी मातृभाषाओं का अधिकतम उप्योग कर और व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक स्थर पर भारत की सभी बोलियों को हमारे देश के एहम विषयों के खंडन में तन्मय करें। यह सन्देश उस दिशा में एक छोटा कदम है।

धन्यवाद

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